आस्था, विश्वास और साधना की कांवड़ यात्रा
- न्यूज़ डेस्क
- 11/08/2026
- धर्म एवं संस्कृति
- कांवड़ यात्रा
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इस वर्ष की कांवड़ यात्रा आज (11 अगस्त 2026) को सावन शिवरात्रि जलाभिषेक के साथ संपन्न हो गई। यह यात्रा प्रत्येक वर्ष पवित्र श्रावण मास (सावन) के साथ आरंभ होती है एवं सावन शिवरात्रि (जलाभिषेक) के साथ संपन्न हो जाती है।
पौराणिक दृष्टि कांवड़ यात्रा का संबंध समुद्र मंथन की घटना से है। समुद्र मंथन परिणामस्वरूप सर्वप्रथम हलाहल (विष) निकला था। इस विष के प्रभाव से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने इसे ग्रहण कर लिया। विष का प्रभाव इतना भयंकर था कि भगवान का कंठ नीला पड़ गया और उसमें तीव्र जलन होने लगी। तब देवताओं ने उनके ऊपर पवित्र जल डालकर विष के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया। इस यात्रा से जुड़ी कुछ अन्य कथाओं का भी उल्लेख मिलता है जैसे- भगवान शिव के परम भक्त रावण द्वारा शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाना आदि।
भगवान शिव पर अटूट आस्था रखने वाले शिव भक्त इस यात्रा के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए नंगे पैर पवित्र स्थलों जैसे – हरिद्वार, गंगोत्री और गोमुख आदि से पवित्र गंगाजल कलशो में भरकर अपने स्थानीय शिवालयों में अर्पित करते हैं। कांवड़ बांस के एक मजबूत डंडे के दोनों सिरों पर रस्सी की सहायता से बंधे कलशों को कहते हैं।
कांवड़ ले जाने वाले को कांवड़िया कहा जाता है। पूरी कांवड़ यात्रा के दौरान शिव भक्त कांवड़ को कंधे पर लेकर चलते हैं और कांवड़ भूमि को स्पर्श न करे इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। यात्रा को नंगे पैर चलकर पूरा किया जाता है। इस दौरान कांवड़िए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं एवं सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। कांवड़िए इस यात्रा के प्रारंभ से अंत तक धार्मिक भजनों के साथ ‘बोल बम’ का जाप भी करते हैं।
इस यात्रा में सभी वर्णों के लोग बिना किसी जाति, वर्ग, आयु अथवा लिंग के भेदभाव के भाग लेते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टर्स और सामाजिक सर्वेक्षणों के अनुसार इस यात्रा में सामान्य वर्ग के साथ-साथ बड़ी संख्या में पिछड़ा वर्ग एवं एससी / एसटी वर्ग के लोग शामिल होते हैं। इनमें भी अधिकांश लोग ग्रामीण अथवा अर्ध-शहरी क्षेत्रों से आते हैं, जो विभिन्न आर्थिक स्तर के होते हैं।


