विरोध और अंधविरोध का घटता अंतर
- संपादकीय कक्ष
- 07/08/2026
- संपादकीय
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संपादकीय कक्ष। संसद के मानसून के सत्र के दौरान विपक्षी दलों द्वारा कार्यवाही को बाधित करना, हंगामे और नारेबाजी का सहारा लेकर गतिरोध उत्पन्न करना, विरोध से अंधविरोध की ओर बढ़ते उनके कदम का परिचायक है। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच हुई बातचीत, जो किसी भी परिणाम तक नहीं पहुंची यह इस बात को और सुद्रण बनाता है।
इस बातचीत के विफल होने से संसद के इस चालू सत्र के दौरान हंगामे और गतिरोध खत्म न होने की संभावना और प्रबल हो गई है। नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) इस बात पर अड़े हुए हैं कि जब तक गृह मंत्री अमित शाह कोई वक्तव्य नहीं देते और राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले में सदन में चर्चा नहीं होती तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चल सकती है।
विपक्ष ने अपनी शर्तें मनवाने के लिए अंधविरोध का रास्ता चुना है। सदन की कार्यवाही बिना किसी हंगामे के संपन्न हो, यह पूर्वकाल की बात हो गई है।
विपक्ष एक प्रकार से केवल विरोध की राजनीति पर उतर चुका है, उसकी न तो किसी विषय पर कोई ठोस तैयारी दिखती है और न ही एक उचित प्रयास। यदि विपक्ष किसी मुद्दे को उठाता भी है, तो केवल इसलिए कि वह सत्तारुढ़ दल को घेर सके, पर इसमें भी उसे असफलता ही प्राप्त होती है।
यह अब सर्वविदित हो चुका है कि विपक्ष की ओर से सरकार द्वारा प्रस्तावित किसी विधेयक अथवा किसी निर्णय पर केवल विरोध और स्पष्ट कहें तो अंधविरोध ही होता है। इसी अंधविरोध के चलते चर्चा में बने रहने के लिए उन्हें अलोकतांत्रिक तरीकों का सहारा लेना पड़ता है।
विपक्ष की ओर से किसी विधेयक अथवा मुद्दे पर रचनात्मक और सकारात्मक सहयोग का घटना लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करता है। इससे संसद की महत्वत्ता और गरिमा दोनों का ह्रास होता है। यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो लोकतंत्र के मंदिर से जनता का विश्वास डगमगाने लगेगा।
विपक्ष को यह समझना चाहिए कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाते हुए भी अपनी बात रख सकते हैं। आज यह आवश्यक हो गया है कि विपक्ष सत्तारुढ़ दल के साथ संसदीय मूल्यों की पुनर्स्थापना कर एक सकारात्मक विचार के साथ आगे बढ़े।


